Tuesday, 21 August 2012


        जिंदगी

जिंदगी से भाग मत वरना

बहुत ये भगायेगी

जिंदगी को भींच के रख

अपनी बाहों मे सम्हाल

वरना ये तो रेत की

माफिक फिसलती जायेगी

धुप भी है छाँव है ,गम

औ खुशी की नाव है

एक सिल्ली बर्फ की है

दर्द है अहसास है

कभी लगती दूर तो

लगती कभी ये पास  है

एक दरिया है जो बहता

सूखता जो जा रहा

पी ले तू जी भर इसे

ये सूख एक दिन जायेगी

जिंदगी से भाग मत वरना

बहुत ये भगायेगी

जितेन्द्र मणि





अंधेरा ही निगल जायेगा

जो चाँद खुद किसी की

ले पनाह रोशन हो

वो चाँद ख़ाक अँधेरा

मिटा भी पायेगा

जो अपने नूर से दुनिया

को करता हो रोशन

ऐसा सूरज तलाश

अँधेरा मिटाएगा

जरा जल्दी से रोशनी

का करले इंतज़ाम

वरना तो तुझको अंधेरा

ही निगल जाएगा

जितेन्द्र मणि   

    मेरा ज़मीर

मेरा ज़मीर है बाजार की जीनत तो नहीं

नहीं बिकेगा कभी इसकी कोई कीमत भी नहीं

कौन है जो इसे खरीद कर के दिखलाये

किसी मे ऐसा हौसला नहीं हिम्मत तो नहीं  

किसी के पास भी ज़मीर  खरीदने के लिए

इतना ज़ज्बा नहीं है,इतनी तो दौलत भी नहीं

जितेन्द्र मणि

Friday, 17 August 2012


        ईद का पैगाम

आपस के रंजो गम को सभी भूल जाए हम

सब आओ मिल के जन्नत ए जहां बसाए हम

ये पाक चाँद ईद का देता है ये पैगाम

इस बार सिर्फ हाथ नहीं दिल मिलाये हम

ये नफरतो के दौर हो हम कर दे अलविदा

फिर से कभी न लौट के आये मेरे खुदा

दंगो में जब भी जितनी भी इंसान मर गये

न ये कहो की हिंदू मुसलमाँन मर गये

बस सच यही है मान लो शैतान के हाथों  

बंदा ए खुदा थे सभी इंसान मर गये  

अशरफ हो काशीनाथ हो क्या फर्क  है हमे

दंगो मे गर बचा सके इंसान बचाए हम

आपस की नफरतों को कहे अलविदा अभी

हिंदू या मुसलमान का भेद भूल जाये हम

इंसान नियामत है उस अल्लाह पाक की

इंसान है खुद की जरा इंसान बनाये हम

जितेन्द्र मणि   

     ईद मुबारक



आपस के भेदभाव सभी भूल जाय हम



फूलों की तरह फिजा मे खुशबू फैलाये हम



अल्लाह ने सब कुछ दिया हमको बहुत मगर



दिल मे भरा हामी ने तो वो मजहबी ज़हर



मुल्को को सरहदों को दिलों को भी लिया बाँट



हम बंट गये घर बंट गये बंट ही गये जज्बात



छोड़ो पुराना राग नया गीत सुनाओ



अब हाथ के संग ही में अपना दिल भी मिलाओ

  
ये पाक चाँद ईद का है दे रहा पैगाम



इस ईद पे गले भी मिलो दिल भी मिलाओ


 रुक जायेंगी बस आप ही नफरत की आंधियाँ



हर दिल मे तुम शमा ए मुहब्बत तो जलाओ



अब खुद को मिटा के ही बस मिटेगा अँधेरा



खुद के लहू से शामाँ ए अमन तो जलाओ



जितेन्द्र मणि



अपने दर पे  मुझे भी ले मेरे गरीब नवाज

या मेरे मौला या मेरे गरीब नवाज़

उठा के हाथ मैं भी मांगता हूँ तुझसे आज

मुझे न चाहिए इस दो जहाँ की दौलत भी

न मुझको चाहिए ओहदा ना ही तख़्त ओ ताज

अगर करम ही तु है चाहता करना मुझ पे 

छेड दे मुझमे भी तु अपनी बंदगी का साज

मुझसे कर दूर खुदी इतना रहम हो जाए

अपने दर पे  मुझे भी ले मेरे गरीब नवाज

जितेन्द्र मणि 

Thursday, 16 August 2012


           दुआ

मेरी एक दुआ तो कबूल कर

मेरी हमसफ़र वो बने कभी

मेरे साथ हाथों मे हाथ ले

मेरे साथ मे वो चले कभी

हो मेरी दुआओं मे खाब मे

मेरी हसरतो मे मिले कभी

मेरी राह को तु सवांर  दे

मेरी चाहतों के फूल से

मेरा जन्नतों सा हो ये सफर

चाहे इसके आगे सफर न हो

चाहे इसके बाद किसी दुआ का

मेरे मौला कोई असर न हो