Sunday, 5 August 2012


आओ नया भारत नया भारत बनाये हम

आओ नया भारत नया भारत बनाये हम

हर  ओर अमन ओ चैन जहा बसाये हम

इस देश के दुश्मन को मिल के खाक करे हम

स्वतन्त्र्ता दिवस पर सभी शपथ खाए हम

जो बात सिर्फ्र हन्दू मुसलमान की करे

नफरत का ज़हर देशवासियों मे जो भरे

वोटों के लिए पहने टोपियां करे हवन

जिसके लिए बस लूटने के वास्ते वतन

जो सिर्फ करे बात यहाँ जात पात की

जो वोट की करे फिकर ,नहीं जज्बात की

उनको भी मजा एक बार तो चखाएं हम

आओ नया भारत नया भारत बनाये हम

इस देस मे अब आम जन की फ़िक्र कहा  है

नेताओ के भाषण मे इनका जिक्र कहा है

जो समझे दर्द आम का वो ही बनेगा खास

मत टूटने दो दर्द भरी जनता की ये आस

आओ अब सभी लोग भले ही  जिताए हम

अब बीते साठ वर्ष इसी  इंतज़ार मे

हर बात का इलाज़ सिर्फ रखा प्यार मे

इंसान को तरजीह दे इंसानियत यही

माँनो तो दोस्त एक बार मेरी भी कही

सच्ची आजादी देश को आओ दिलाए हम

आओ नया भारत नया भारत बनाये हम

जितेन्द्र मणि

Friday, 3 August 2012


          हमसाया

जिसने ताउम्र था रहने का साथ वादा किया

जिसने हमसाया बनके साथ का वचन दिया

समझ सका न ये फरेब तब तलक जब तक

रोशनी और नूर साथ मे रही जब तक

जो रोशनी की जद तलक बना रहा साया

अंधेरे आते ही कही नज़र नहीं आया

मेरे साये की तरह वो भी फरेबी निकला

मेरा हमसाया भी साया की तरह ही निकला

जितेन्द्र मणि      

             माँ ओ माँ

जीवन के थपेडों से लड़खड़ा जाता है जब तन

थक जाता है मन तो तू याद अति है माँ

जब लहरों के झँझावात मे उलझ सा जाता हूँ

कही से भी रहत की रौशनी नहीं पाता हूँ

जब हांर हार हार जाता हूँ तो तू याद आती है माँ

जब दूर तलक दीखता है अंधेरे का डेरा

मुश्किल भरी डगर हो दीखता नहीं सवेरा

हौसले की चाह हो तो तू याद आती है माँ

जब थकान के बोझ से नींद नहीं है आती

लंबी काली रात अपनी नागिन सी लटें फैलाती

रौशनी की चाह हो तब तू याद अति है माँ

जब सफलता चूमने लगती है क़दम

विजय की अट्टालिका पे चढ़ इतराते है हम

तब स्नेह भरे स्पर्श को तू याद आती है माँ

जब लोग कहते है की खुदा नहीं होता

इश्वर का तो कोई अस्तित्व ही नहीं होता

उन्हे झुठलाना हो तो तू याद आती है माँ

जब मन खोजता है वो आँचल वो लोरी

ममता की छाँव ,स्नेह करुणा की कटोरी

जब छोना चाहूँ पाँव तो तू याद आती है माँ


जितेन्द्र मणि          

Thursday, 2 August 2012


श्री चंद्रप्रकाश मिश्र जो मेरे फूफा जी है इसी साल भारतीय प्रशासनिक सेवा से सेवानिवृत् हुए है के मनोभावों को वो व्यक्त करने के प्रयास मे चंद पंक्तियां 
     

तेरी बलाएँ मैं ले लूँ और तू दुआ ले ले

खुदा करे तू जमीं से फलक को भी छू ले

नहीं भूलूँगा तेरा प्यार अब कभी भी मैं

तेरा तू जान तू चाहे तो अब मुझे भूले

कतरा कतरा भी लुटाया गुलो गुलशन के लिए

तुझे भी चाहिए तू भी मेरा लहू ले ले

मैने एक राह बनायी थी अपनी जानिब ही

मेरी बुलंदियों  को तू भी या खुदा छू ले

मुझको हासिल है सब एक तेरी चाहत से

मेरे गुलशन तू दुआ ले मेरा वजू ले ले

फ़साना बन के मैं गूंजा किया ज़माने मे

कहानी बन गया खुद कहानी सुनाने मे

जाने कब राह खत्म हो गयी मेरी या खुदा

लगा रहा मैं अपने फ़र्ज़ को निभाने मे

मेरी फितरत ही रही चरागों सी जलने की

जला एक उम्र तलक जिससे समां रोशन हो

बस यही आखरी है आरज़ू मेरे दिल की

हरा भरा सदाबहार मेरा गुलशन हो


जितेन्द्र मणि    

Wednesday, 1 August 2012

मंदिर भी बनाओ यहाँ मस्जिद भी बनाओ 

मंदिर भी बनाओ यहाँ मस्जिद भी बनाओ
पर पहले खुदा को जरा मन मे तो बसाओ
माला तिलक घंटी से अब बनेगी नहीं बात
चिल्ला के बोलने से खुदा सुनते नहीं बात
उसमे जरा सा भाव का भी लेप लगाओ
इंसान के जज्बातों को भी दो जरा तरजीह
उसको न कष्ट दो कभी उसको ना रुलाओ  
इंसानियत से है जुड़ा हर धर्म का आधार
इंसान बन के सबसे पहले मुझको दिखाओ

जीतेन्द्र मणि  

           खुदारा खुदारा

वो निकले है घर से यूँ जुल्फों को खोले

दिखा दोपहर सांझ का फिर नज़ारा

खुदारा खुदारा, खुदारा खुदारा

समा थम गया उनका दीदार करके

मेरा दिल भी धडका उन्हे प्यार करके

वो ही जान जीने का है वो सहारा

खुदारा खुदारा, खुदारा खुदारा

जो पलकें है उठती गज़ब है वो ढाती

सभी को वो अपना दीवाना बनाती

वो जो मुस्कुराती तो गुल खिलने लगते

वो आँखें अज़ब दास्ताने सुनाती

दिखाया उन्होंने गज़ब ये नज़ारा  

खुदारा खुदारा, खुदारा खुदारा

जितेन्द्र मणि

खुदा ही मुहब्बत मुहब्बत खुदा है

खड़ी दरबार मे थी वो मुहम्मद औलिया के जब

बड़ी किस्मत थी मैं भी दर ख्वाजा के पंहुचा तब

तभी गूँजा  जहन मे अपने ख्वाजा का यही पैगाम

मुहब्बत से बड़ा कोई नहीं ये है सबसे बड़ा इमाँन

मोहब्बत ही इबादत है इबादत ही मुहब्बत है

तो फिर वो कौन है जो इबादत करना भी चाहेगा

खुदा से करना  मुहब्बत यही हर शख्स मांगेगा

खुदा तू माफ करना हमने बस ये तय किया है अब

इबादत की जगह कर ले न क्यों उससे मुहब्बत अब

जितेन्द्र मणि