Friday, 7 September 2012


हाई कोर्ट दिल्ली बम बिस्फो़ट

वो आया सूटकेस मे ले मौत का सामान

किस बुजदिली से देखो अपना काम कर गया

इंसान हैवानी हदों के पार कही जा

कितनी गिरी हरकत ये सरेआम कर गया

उठा धमाका एक जो इंसाफ के दर पे

इंसा का जिस्म चिथडे के मानिंद बिखर गया

गम ये है नफरतों के ज़लजले के बीच

हिंदू मारा या कोई मुसलमान मर गया

गम है तो ये की फिरकापरस्ती की आग मे

शैतान के हाथो से फिर इंसान मर गया

जितेन्द्र मणि    

      लानत है

प्यार करना पड़े तो लानत है

सुना है प्यार का इजहार करती है आंखे

लवों से प्यार का इजहार करना पड़ता हो

ऐसे इज़हार करना पड़े तो लानत है

सुना है प्यार तो हो जाता है औचक से ही

कोई दिल को भा जाता है यूँ ही देख मणि

कर के तैयारी जो दिल खोना पड़े

ऐसे इजहार ए इश्क मे भी गर रोना पड़े

ऐसे दिल खोना पड़े तो लानत है  

जितेन्द्र मणि   

Thursday, 6 September 2012


मेरी जाँ लिए बैठे है

कितने गुम सुम से वो जो

लव को सिए बैठे है

है मेरी जाँन वो  मेरी

जाँन लिए बैठे है 

सुकून ओ चैन मैने अपना

 उनके नाम किया  

दिल तो था ही उन्ही का

दे के बस सलाम किया

मेरा दिल ले लिया देने मे

क्यों वो ऐठे है

जितेन्द्र मणि

Monday, 3 September 2012


बिना बुर्के के चाँद ,चाँद देखने निकला

गज़ब हुआ ये नजारा कितना उजला उजला

अपना व्रत तोडने को मेरा चाँद आया था

मेरी उम्र के लिए उसने व्रत उठाया था

मगर सभी की बड़ी तेज आज किस्मत थी

उन्हे तो एक संग दो चाँद देखने को मिला

जितेन्द्र मणि  

 



खुद को खोने का

भी मलाल नहीं

जहां का खुद का

भी ख्याल नहीं

अभी तलक तो खुद को

खोजता मैं दर बदर था

गली कूचा सभी राहों में

मैं शाम ओ शहर था  

खुदी को खो के ही मैने

तो तुमको  पाया था

खुदा ने खुद ही मुझे

आपसे मिलाया है
जितेन्द्र मणि  

Friday, 31 August 2012


चांदनी रात मे दो चाँद के दीदार ना हो

 

सुनों भवरों मेरी गुजारिश तुम कबूल करो

तुम मेरे चाँद के आगे नकाब बन के चलो

आज की रात मेरा  चाँद आ रहा मिलने

इतना सफाक़ उजला चाँद देखा है किसने

चाँद फलक मे भी ,है चाँद जमी पर भी यहाँ

वहाँ  है दाग लिए चाँद ,है चाँद बेदाग यहाँ

फलक का चाँद कही खुद से शर्मसार ना हो

चांदनी रात मे दो चाँद के दीदार ना हो

जितेन्द्र मणि  

    प्यार की रस्म

वो पूछने लगे मेरे दिल के धडकने का सबब

ना तेरा नाम बताने को थे तैयार ये लव

सुर्ख आँखों से बहुत कुछ तो हो रहा था बयां

मेरे  चेहरे पे थे बाकी अभी भी  उसके निशाँ

ना वो रुसवा हो कभी,जाये जाँ ना खुले ये लव

निभाऊँ प्यार को बस इतनी इल्तेजा है या रब

जितेन्द्र मणि