Tuesday, 24 July 2012


जो उसका नूर ही

जो उसका नूर ही हर सू दिखाई दे मुझको

करूँ मैं क्या सदा उसकी सुनाइ दे मुझको

निभा सकूँ बड़ी पाकीजागी से रस्म ए वफ़ा

इतनी ताकात तो ऐ अहले खुदाई दे मुझको

फ़ना कर दू ये जिस्म यार पे मैं हस कर के

लुटा दूँ दिल और प्यार यार पे मैं  हँस कर के

उसी मे आप खुदा ही दिखाई दे मुझको

वफ़ा ईमान की रसम नई बना दू मैं

खुदी को खुद को ,खुदाई को भी लुटा दूँ मैं

उसके सजदा करूँ नज़रें बिछाऊ उसके लिए

वजूद अपना भी हँस कर के बस मिटा दूँ मैं

वो बिछडें ना कभी बस ये दुहाई दे मुझको


जितेन्द्र मणि  

Monday, 23 July 2012


    आ खुशी आ

आ खुशी आ किसी बहाने से

तुझको देखा नहीं जमाने से

दर्द अब आँख नम नहीं करता

रो दूँ शायद मैं खुशी पाने से

जिस्म ये जख्म का समंदर सा

दिल मे चलता है कुछ बवंडर सा

अब तो अपने भी गैर लगते है

गैर से बड़ा घाव देते है

गैरो से ही जख्म मिले अब तो

अच्छा अपनों से जख्म खाने से   

आ खुशी---------------------से

खार से तन ये जार जार हुआ

हादसा मुझसे बार बार हुआ

प्यार के गीत भी कितने बेगाने लगते है

मिलन के राग भी झूठे तराने लगते है

अब तो मिलता है सुकून इस दिल को  

दर्द ए दिल दर्द के तराने से

आ खुशी आ किसी बहाने से

तुझको देखा नहीं जमाने से
जितेन्द्र मणि               

         कभी रुसवा न होना

कभी रुसवा न होना जिन्दगी दुश्वार लगती है

तुम्हारे संग तो वीरानिया गुलजार लगती है

तुम्हे पाकर ही जाना जिन्दगी होती है जिंदादिल

मेरी तनहाईयाँ आने से तेरे बन गयी महफ़िल

तुम्हारे बिन भवर मे नैया बिन पतवार लगती है

कभी ------------------------जिन्दगी ---------------है

तुम्ही हो जिन्दगी मेरी तुम्ही हो बंदगी मेरी

तुम्हारे पास होना ही अब तो हर खुशी मेरी

तुम्हारे बिन तो हमदम जिन्दगी लाचार लगती है

कभी ---------------------जिन्दगी -----------------है

तुम्हारे संग पथरीली डगर बनती गयी गुलफाम

तुम्ही हो आरजू मेरी तुम्ही दिल का बनी अरमान

तुम्हारे बिन मेरी बगिया बिना गुल खर लगती है

कभी---------------------जिन्दगी-------------------है                   


                         
तेरे नाम करता चलूँ  

एक अरसे से तो दिन गुजरा मेरा गुमसुम सा

तेरे पहलू मे अपनी रंगीन शाम करता चलूँ

तेरी नजरे है एक मैखाना ओ मेरे दिलवर

अपने हिस्से मे भी दो चार जाम करता चलूँ

बड़ा है नाम चीन मेरा यार महफ़िल मे

उसीसे से जुड के ही कुछ अपना नाम करता चलूँ

नहीं हिस्से मे मेरे शोहरत ए जमाल मणि   

मैं करके इश्क खुद को बदनाम करता चलूँ    

जितनी साँसे जितनी धड़कान बची है इस दिल मे

अपने दिलवर के नाम ये तमाम करता चलूँ

चालू अभी तो बहुत दूर तलक़ चलना है

सफर पे निकलू ,ये भी अपना काम करता चलूँ

ये गज़ल तुझपे है निसार जानेमन मेरी

दिल जिगर जान गज़ल तेरे नाम करता चलूँ    


                    

जिन्दगी

हम जिन्दगी को खुशनुमा करने मे रह गये

गम हर किसी का स्वयं ही सहने मे रह गये

समझा किसी ने भी नहीं अपना हमे कभी

हम सबको यू ही अपना सा कहने मे रह गये

खुद को है क्या पसंद कभी गौर न किया

अपनों की आरजू को ही बस अपना कहा गये

ये जिन्दगी तो सीख ही देती रही मुझे

क्या आदमी है वो जो सिर्फ खुद को ही जिए

ये पाठ मैने पढ़ लिया अपना लिया इसे

सबकी करी मदद जरूरत लगी जिसे

अमृत पिलाया सबको जहर छाट के पिया

हर  आरजू को दफ़न करने मे राह गये

गम हर  किसी का स्वयं ही सहने मे रह गये




माँ की दुआ
जिन्दगी ढूढ ही लेती है बहाने कितने
बन ही जाते है जवानी मे फसाने कितने
ऐ खुशी राह मेरे घर का भी क्या भूल गयी
तेरे दीदार को बीते है जमाने कितने
जाने कितने तो जख्म खाए है जिस्म ने मेरे
इनपे मरहम लगे है बीते जमाने कितने
भीड़ सी एक मेरे साथ मे भी चलती थी
आज समझा वो सभी निकले बेगाने कितने
जिनको हर बार हमने खुश किया अपने दम पे
आज देखो बना रहे है बहाने कितने
बस एक माँ की दुआए निभा गयी है वफ़ा
असर है आज भी बीते है जमाने कितने


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jitendra mani
acp admin
pcr phq

Friday, 20 July 2012


ये लकीरो बस खेल है मुझें तुझसे कोई गिला नहीं

जो खुदा ने रहम नहीं किया तेरी बेवफाई से सिला नहीं

खुशियो के पल मेरे हिस्से मे परवरदिगार न दे सका

मेरी जिंदगी चादर है वो पैबन्द जिस्स्मेय टका टका

अब खार रास ही आ गए वो रिश्ता मुझसे निभा गए

इस मतलबी दुनिया मे वो ,बेगरज साथ निभा गये
उन सुर्ख फूलों का क्या करे जो ताप से मुरझा गये