Monday, 10 September 2012


       विद्रूपता

देख के इतनी भयानक दुनिया

भरी काँटों से भयावह दुनिया

जहा प्यासे सभी देखो लहू के

ऎसी शोषक है ये अज़ब दुनिया

नोच कर खा रहे एक दूसरे को

बड़ी है क्रूर ये गज़ब दुनिया

देख कर इसको एक मासूम बच्चा

बड़ा होने  से भी घबरा रहा है

जिस तरह कर रहे हम भ्रूण हत्या

अरे मासूम की वो घृणित हत्या  

अरे जो कोख मे है अपनी माँ की

जन्म लेने से भी कतरा रहा है

जितेन्द्र मणि

Sunday, 9 September 2012


        मिलावट

जिन्दगी से तंग आ कल रात उसने

जहर की गोली मंगाया खा गया

सुबह वो जिन्दा उठा था ठीक सा

उसका सर इस बात से चकरा गया

खैर जो भी हुआ वो अच्छा हुआ

रह के जिन्दा बहुत ही वो खुश हुआ

मगाई उसने मिठाई खुशी से

शुक्रिया उसने कहा प्रभु खुशी से 

चढा कर मंदिर मे उसको खा गया

मगर फिर उसका था सर चकरा गया

मिलावट से थी मिठाई जहरीली वो

फिर गया देखो सो अंतिम नींद वो  
 
जितेन्द्र मणि

  

Friday, 7 September 2012


हाई कोर्ट दिल्ली बम बिस्फो़ट

वो आया सूटकेस मे ले मौत का सामान

किस बुजदिली से देखो अपना काम कर गया

इंसान हैवानी हदों के पार कही जा

कितनी गिरी हरकत ये सरेआम कर गया

उठा धमाका एक जो इंसाफ के दर पे

इंसा का जिस्म चिथडे के मानिंद बिखर गया

गम ये है नफरतों के ज़लजले के बीच

हिंदू मारा या कोई मुसलमान मर गया

गम है तो ये की फिरकापरस्ती की आग मे

शैतान के हाथो से फिर इंसान मर गया

जितेन्द्र मणि    

      लानत है

प्यार करना पड़े तो लानत है

सुना है प्यार का इजहार करती है आंखे

लवों से प्यार का इजहार करना पड़ता हो

ऐसे इज़हार करना पड़े तो लानत है

सुना है प्यार तो हो जाता है औचक से ही

कोई दिल को भा जाता है यूँ ही देख मणि

कर के तैयारी जो दिल खोना पड़े

ऐसे इजहार ए इश्क मे भी गर रोना पड़े

ऐसे दिल खोना पड़े तो लानत है  

जितेन्द्र मणि   

Thursday, 6 September 2012


मेरी जाँ लिए बैठे है

कितने गुम सुम से वो जो

लव को सिए बैठे है

है मेरी जाँन वो  मेरी

जाँन लिए बैठे है 

सुकून ओ चैन मैने अपना

 उनके नाम किया  

दिल तो था ही उन्ही का

दे के बस सलाम किया

मेरा दिल ले लिया देने मे

क्यों वो ऐठे है

जितेन्द्र मणि

Monday, 3 September 2012


बिना बुर्के के चाँद ,चाँद देखने निकला

गज़ब हुआ ये नजारा कितना उजला उजला

अपना व्रत तोडने को मेरा चाँद आया था

मेरी उम्र के लिए उसने व्रत उठाया था

मगर सभी की बड़ी तेज आज किस्मत थी

उन्हे तो एक संग दो चाँद देखने को मिला

जितेन्द्र मणि  

 



खुद को खोने का

भी मलाल नहीं

जहां का खुद का

भी ख्याल नहीं

अभी तलक तो खुद को

खोजता मैं दर बदर था

गली कूचा सभी राहों में

मैं शाम ओ शहर था  

खुदी को खो के ही मैने

तो तुमको  पाया था

खुदा ने खुद ही मुझे

आपसे मिलाया है
जितेन्द्र मणि