Tuesday 18 March 2014


चलो इस हिल रही दीवार को गिरते है

 

 

हम तो इन आधियों का जोर आजमाते है

आँधियों मे ही हम  चराग को जलाते है

अपनी उल्फत है इस जोर अजमाइश से

मगर चराग मे  अपना लहू जलाते है

लाख मुझको मिटाना चाहा आंधियों ने मगर

इन्ही हवाओं की तपिश से ही जल जाते है

सिर्फ हंगामे सब अब बात नहीं हल होगी

चलो इस हिल रही दीवार को गिरते है

सुना है रोशनी आती है घुप्प अंधेरे पे

चलो अँधेरा थोड़ा और हम बढाते है

बड़ा कमाल महलों मे ना नीद आये उन्हे

बड़े सुकून से सड़क पे हम सो जाते है

अज़ब है दुनिया तेरी ओ मेरे परवरदिगार

कुछेक भूख से ,,कुछ खा के भी मर जाते है

 

 

  जितेन्द्र मणि

अतिरिक्त पुलिस उपायुक्त

दिल्ली

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